यक्षिणी साधना

👾।।हर हर महादेव शम्भो काशी विश्वनाथ वन्दे ।।👾
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||||||||||||👉|  यक्षिणी साधना ----
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👉    निराकार ब्रह्म शिवजी की लीला को समझने ब्रह्मा विष्णु महेश भी सक्षम नही । 14 लोकमे देव ,दानव , यक्ष ,किन्नर ,गंधर्व,चारण , नाग , वानर ,भाल्ल ...न जाने कितनी सृष्टि और शक्तियां है । महान ऋषिमुनियो ने समय समय पर आवश्यकता अनुसार विविध यजन पूजन उपासनाओं द्वारा इस सृष्टि की शक्तिओ का भरपूर उपयोग किया और मानवजाति के कल्याण हेतु ऐसे हजारो विधान मार्गदर्शित किये है । यक्षिणी साधनाओ द्वारा ऋषियो ,राजा महाराजाओं ,साधकोंके अनेक प्रकार के दिव्य कार्य किये । कुछ साधको के वंशधारोने इन्हें ही कुलदेवी देवता स्वरूप स्थापित किया  जो आज भी ऐसे कही कुलमे यक्षणीमाता पूजी जाती है । 

 👉यक्षिणी साधना के विषय मे समाज में बहुत सी गलत धारणाएँ हैं । कुछ लोगों का मानना है कि यक्षिणी मनुष्य का खून चूसती हैं। प्रत्येक व्यक्ति के मन यक्षिणी साधना के सम्बन्ध में कई प्रकार की धारणा है कुछ साधक इस विषय अंजान है । आज्ञानता के कारण इस साधना के बारे में गलत सोचते है इस साधना तामसिक साधना समझते हैं बहुत से लोग यक्षिणी का नाम सुनते ही डर जाते हैं कि ये बहुत भयानक होती हैं, किसी चुडैल कि तरह, किसी प्रेतानी कि तरह, मगर ये सब सब आज्ञानता है ।

 👉यक्षिणी एक सौम्य और दैविक शक्ति होती है देवताओं के बाद देवीय शक्तियों के मामले में यक्ष का ही नंबर आता है हमारे भारतीय पौराणिक ग्रंथो में बहुत सारी प्रमुख रहस्यमयी जातियां का वर्णन मिलता है । जैसे कि देव गंधर्व ,यक्ष, अप्सराएं, पिशाच, किन्नर, वानर, रीझ, ,भल्ल, किरात, नाग आदि यक्षिणी भी इन रहस्यमय शक्तियो के अंतर्गत आती है ।

👉 देवताओं के कोषाध्यक्ष महर्षि पुलस्त्य पौत्र विश्रवा पुत्र कुबेर भी यक्ष जाती के हैं । जैसे कि देवताओं के राजा इंद्र है वैसे ही यक्ष यक्षिणी काराजा कुबेर है कुबेर को यक्षराज बोला जाता है यक्ष यक्षिणियां कुबेर के अधीन होती है। कुछ साधको के मन शंकाएं होती है कि यह किसी रूप मे सिद्ध होती है कुछ लोगों की धारणा यह सिर्फ प्रेमिका रूप में सिद्ध की जा सकती है जो कि बिलकुल गलत है साधक इच्छा अनुसार किसी भी रूप सिद्ध कर सकता है । इच्छा अनुसार, माता , पुत्रीव स्त्री ( पत्नी ) के रूप में सिद्ध कर सकते है यक्षिणियों की साधना अनेक रूपों में की जाती है, जैसे माँ, बहन, पत्नी अथवा प्रेमिका के रूप में इनकी साधना की जाती है, ओर साधक जिस रूप में इनको साधता है ये उसी प्रकारका व्यवहार व परिणाम भी साधक को प्रदान करती हैं, माँ के रूप में साधने पर वह ममतामयी होकर साधक का सभी प्रकार से पुत्रवत पालन करती हैं तो बहन के रूप में साधने पर वह भावनामय होकर सहयोगात्मक होती हैं, ओर पत्नी या प्रेमिकाके रूप में साधने पर उस साधक को उनसे अनेक सुख तो प्राप्त हो सकते हैं किन्तु उसे अपनी पत्नी व संतान से दूर हो जाना पड़ता है ।उड्डीश तंत्र में जिक्र मिलता है कि इस को किसी भी रूप मे सिद्ध किया जा सकता है ।

 👉 यक्षिणियों की सिद्धि प्राप्त करने हेतु दृढ़ इच्छाशक्ति होना आवश्यक है तथा साधन एवं विधान के बारे में जानकर प्रयास किए जाएं। इसके अलावा कई वनस्पतियों यानी पौधों या वृक्ष में यक्षिणियां निवास करती हैं...

(1) वटवृक्ष में वट यक्षिणी- धन प्राप्ति

(2) चिंचा वृक्ष में विशाला यक्षिणी- धन प्राप्ति

(3) महुआ वृक्ष में मेखला यक्षिणी- दिव्य रसायन

(4) बिल्व वृक्ष में महायक्षिणी- ऐश्वर्य प्राप्ति।

(5) वटवृक्ष में चन्द्रद्रवा यक्षिणी- दिव्य रसायन

(6) पीपल वृक्ष में धनदा यक्षिणी- धन प्राप्ति

(7) आम के वृक्ष में पुत्रदा यक्षिणी- पुत्र प्राप्ति

(8) धतूरे के वृक्ष में धात्री यक्षिणी- अशुभ नाश

(9) गूलर वृक्ष में विद्यादात्री यक्षिणी- ज्ञान प्राप्ति

(10) निर्गुण्डी वृक्ष में विद्यादात्री यक्षिणी- ज्ञान प्राप्ति

(11) अर्क के पेड़ में जया यक्षिणी- कार्यसिद्धि

(12) श्वेत गुंजा में संतोषा यक्षिणी- कार्यसिद्धि

(13) तुलसी वृक्ष में राज्यदा यक्षिणी- राज्य प्राप्ति

(14) अंकोल वृक्ष में राज्यदा यक्षिणी- राज्य प्राप्ति

(15) कुश वृक्ष में- कुशा यक्षिणी- कार्यसिद्धि

(16) अपामार्ग वृक्ष में अपामार्ग यक्षिणी- सर्व सिद्धि

(17) इनके अलावा उच्छिष्ट यक्षिणी, चन्द्रामृत,

👉 स्वामीश्वरी, महामायाभोग, सुलोचना, विद्या, हटेले देवी इत्यादि देवियां हैं, जो भिन्न-भिन्न सिद्धियां देती हैं।
वृक्ष शुद्ध स्थान व एकांत में होने चाहिए जिनके समीप साधना की जाए। यहां यक्षिणियों का परिचय मात्र है, बाकी जानकारी गुरुमुख से प्राप्त की जा सकती है।
तंत्र में देवी, यक्षिणी, पिशाचिनी, योगिनी आदि अनेक दिव्य शक्तियों की साधना का जिक्र मिलता है। साधना के दो मार्ग है एक वाम और दूसरा दक्षिण। दो तरह की शक्तियां होती है एक देवीय और दूसरी राक्षसी। व्यक्ति को तय करना होता है कि उसे किस तरह की साधना करना चाहिए। हिन्दू धर्मानुसार सिर्फ सात्विक साधना ही करना चाहिए।
 
 👉 नीचे जो साधना बताई जा रही है वह मात्र जानकारी हेतु है। आप साधना के लिए किसी योग्य जानकार से पूछकर ही साधना करें। यदि साधना उचित रीति से नहीं की जाती है तो हो सकता है कि इससे आपका अहित भी हो। हम नहीं जानते हैं कि सही क्या है। यदि आप देवताओं की साधना करने की तरह किसी यक्ष या यक्षिणियों की साधना करते हैं तो यह भी देवताओं की तरह प्रसन्न होकर आपको उचित मार्गदर्शन या फल देते हैं। उल्लेखनीय है कि जब पाण्डव दूसरे वनवास के समय वन-वन भटक रहे थे तब एक यक्ष से उनकी भेंट हुई जिसने युधिष्ठिर से विख्यात 'यक्ष प्रश्न' किए थे। 
 
 👉यक्ष का शाब्दिक अर्थ होता है 'जादू की शक्ति'। आदिकाल में प्रमुख रूप से ये रहस्यमय जातियां थीं:- देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, अप्सराएं, पिशाच, किन्नर, वानर, रीझ, भल्ल, किरात, नाग आदि। ये सभी मानवों से कुछ अलग थे। इन सभी के पास रहस्यमय ताकत होती थी और ये सभी मानवों की किसी न किसी रूप में मदद करते थे। देवताओं के बाद देवीय शक्तियों के मामले में यक्ष का ही नंबर आता है। कहते हैं कि यक्षिणियां सकारात्मक शक्तियां हैं तो पिशाचिनियां नकारात्मक। बहुत से लोग यक्षिणियों को भी किसी भूत-प्रेतनी की तरह मानते हैं। साधन स्वविवेक का उपयोग करें। 

👉यक्षिणी साधक के समक्ष एक बहुत ही सौम्य और सुन्दर स्त्री के रूप में प्रस्तुत होती है। प्रमुख 8 यक्ष और यक्षिणियां भी होते हैं। 

 👉ये आठ यक्षिणियों ने नाम हैं:- 1.सुर सुन्दरी, 2.मनोहारिणी, 3.कनकावती, 4.कामेश्वरी, 5.रति प्रिया, 6.पद्मिनी, 7.नटी और 8.अनुरागिणी। 

 👉यहां प्रस्तुत है अनुरागिणी यक्षिणी के बारे में सामान्य जानकारी।
 
 👉अनुरागिणी यक्षिणी : ---

 👉 यह यक्षिणी यदि साधक पर प्रसंन्न हो जाए तो वह उसे नित्य धन, मान, यश आदि से परिपूर्ण तृप्त कर देती है। अनुरागिणी यक्षिणी शुभ्रवर्णा है और यह साधक की इच्छा होने पर उसके साथ रास-उल्लास भी करती है। 
 
 👉इस यक्षिणी को सिद्ध करने का मंत्र : --++
 
 ॐ ह्रीं अनुरागिणी आगच्छ स्वाहा ॥
 
 👉साधना की तैयारी:---

👉*यह साधना घर में नहीं किसी एकांत स्थान पर करना होती है, जहां कोई विघ्न न डाले।

 👉*उक्त साधना नित्य रात्रि में की जाती है। 

,👉*साधना के पहले उक्त यक्षिणी का चित्र साधना स्थल पर लगा दें। 

👉*साधना काल में किसी भी प्रकार की अनु‍भूति हो तो उसे किसी को बताना नहीं चाहिए।

👉*हवन और पूजा की संपूर्ण सामग्री एकत्रीत कर लें।

*👉साधान स्थल पर पर्याप्त भोजन, पानी और अन्य प्रकार की दैनिक जरूरत की व्यवस्था करके रखें ताकी साधन छोड़कर कहीं जाना न पड़े।
 
 साधना की विधि :---
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👉*भोजपत्र पर लाल चंदन से अनार की कलम द्वारा किसी शुभ मुहूर्त में उस उक्त यक्षिणी का नाम लिखकर उसे आसन पर प्रतिष्ठत करने का उचित रीति से आह्‍वान करके उनकी पूजा करें।

👉*उसके बाद उपरोक्त मंत्र का जप आरंभ करें। कम से कम 10 हजार और ज्यादा से ज्यादा 1 लाख तक का जप का संकल्प लेकर ही जप करें।

👉*जितने भी संख्‍या का जप का संकल्प लिया है उतना जप करने के बाद कम से कम 108 बार हवन में आहुति देकर हवन करें। 

*👉जप और हवन समाप्त होने के बाद वहीं सो जाएं। यह साधना की संक्षिप्त विधि है। किसी जानकार से पूछकर ही साधना प्रारंभ करें।

  👉  आज भी ऐसे अनेक सिद्ध साधु है जो ऐसी शक्तिओ से सम्पन है । हिन्दू सनातन धर्म की प्रचंड शक्तिओ के विषयमे सनातनियो की जानकारी हेतु ऐसे विषय यहां दे रहे है ताकि उन्हें ये ज्ञान रहे के शिवतत्त्व क्या है और शिव उपासना ही सर्वोपरि है ।आप सभी धर्मप्रेमी जनो पर शिवपिता की सदैव कृपा बरसती रहेl

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